उर्मिलेश/ कश्मीर या समाज के किसी भी जटिल व संवेदनशील विषय पर अतिशय राष्ट्रवादी खुमार में डूबकर उन्मादी लेखन करने वालों में मुझे दो तरह के लोग नजर आते हैं। इनमें सारे लोग गलत नहीं हैं। एक श्रेणी उनकी है, जो सचमुच उन्मादी हैं और दूसरी श्रेणी उनकी है, जिन्हें हमारे ज्यादातर न्यूज चैनलों ने अपनी फेक और फर्जी खबरों से अज्ञान के आनंदलोक में डुबो रखा है। दूसरी श्रेणी वालों के प्रति मेरी सहानुभूति है। दरअसल, ये लोग victim हैं, ऐसे अधिकांश लोग निजी न्यूज चैनलों के बडे़ हिस्से द्वारा रचित अज्ञान के में शिकार हुए हैं।
मेरा कष्ट यही है कि उनसे संवाद करने के लिए मेरे पास कोई न्यूज चैनल नहीं है! ऐसे कई लोग मेरी किसी टिप्पणी के लिए मुझे गालियां देते हैं या मेरे देशप्रेम पर सवाल उठाने का मूर्खता प्रदर्शन भी करते हैं। कई लोग सुझाव देते हैं कि मुझे कश्मीर जाकर असलियत देखनी चाहिए, तब लिखना चाहिए। ऐसा सुझाव देने वालों को यह भी मालूम नहीं कि एक पत्रकार के रूप में 1997 से मैं लगातार कश्मीर जाता रहा हूं। उनमें ज्यादातर को यह भी नहीं मालूम कि मैंने 1999 में करगिल युद्ध कवर किया था। पिछले चुनाव को कवर करने भी कश्मीर गया था। कश्मीर के हालात तब बहुत बेहतर थे। सोचिए, आखिर इन तीन सालों में ऐसा क्या हुआ कि हालात बिगड़ने लगे। महज तीन साल पहले तब वहां चुनाव में 65% मतदान हो रहा था। अब 7% से 2% के बीच क्यों होने लगा? ऐसा माहौल क्यों पैदा हुआ? इस बारे में ज्यादा जानना चाहते हों तो कश्मीर पर मेरी दोनों किताबें या नवभारत टाइम्स, आउटलुक और द वायर हिंदी में छपे मेरे हाल के लेखों को पढ सकते हैं। कश्मीर रिपोर्टिंग के अपने इन अनुभवों की रोशनी में अगर कुछ कह रहा हूं तो उस पर सोचिए, सिर्फ गाली मत दीजिए मुझे। नासमझी भरी टिप्पणी करने वालों में ज्यादातर ऐसे होंगे जो शायद ही कभी कश्मीर गये हों, गये भी होंगे तो श्रीनगर से लौट आये होंगे। इन लोगों से कैसे संवाद करूं कि कश्मीर मसले के समाधान का यह तरीका नही है मेरे भाई! यह बात मैं अपने आब्जवे॓शन और अनुभव की रोशनी में कह रहा हूं।
(Urmilesh Urmil के वाल से साभार )

