अमन नामरा/ इंदौर को देश का सबसे साफ शहर कहा जाता है। यही उसकी पहचान है, यही उसका ब्रांड है। लेकिन इसी शहर में, बीते कुछ दिनों में, सीवर मिला पानी पीने से पंद्रह लोगों की मौत हो जाती है। यह संख्या सिर्फ़ आंकड़ा नहीं है—यह राज्य, व्यवस्था और दावों पर एक सीधा आरोप है। ऐसे में सवाल उठना चाहिए था। और सवाल उठा भी।
लेकिन सवाल पर जवाब देने के बजाय सत्ता ने जो किया, वह इस दौर की पत्रकारिता और राजनीति—दोनों का सच खोल देता है।
मध्य प्रदेश–छत्तीसगढ़ के एनडीटीवी के रेज़िडेंट एडिटर अनुराग द्वारी ने वही किया जो किसी भी ईमानदार पत्रकार को करना चाहिए—उन्होंने पूछा कि जब लोग गंदा पानी पीकर मर रहे हैं, तो ज़िम्मेदारी किसकी है। अस्पताल में भर्ती मरीजों को रिफंड क्यों नहीं मिल रहा है। सवाल सीधा था, सार्वजनिक था, और पूरी तरह जनहित में था। जवाब में कैलाश विजयवर्गीय ने गाली दे दी।
यह सिर्फ़ एक पत्रकार और एक मंत्री के बीच की बहस नहीं थी। यह उस सत्ता की मानसिकता का बयान था जो सवाल को अपराध और सवाल पूछने वाले को दुश्मन मानती है।
अनुराग चुप नहीं हुए। उन्होंने वही किया जो आज के दौर में दुर्लभ होता जा रहा है—उन्होंने अपनी बात पूरी शिद्दत से रखी। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर उनकी तारीफ़ हो रही है। लोग कह रहे हैं—“यही होती है पत्रकारिता।”
लेकिन यही वह बिंदु है जहाँ हमें रुककर सोचना चाहिए। क्योंकि तारीफ़ की इस रोशनी के पीछे एक गहरा अंधेरा छिपा है।
सच्चाई यह है कि इस एक सवाल के साथ अनुराग ने अपने लिए खतरा मोल लिया है। राजनीतिक तौर पर भी, और पेशेवर तौर पर भी। सत्ता नाराज़ है—यह तय है। लेकिन उससे भी ज़्यादा जटिल स्थिति उनके अपने पेशे के भीतर है।
मध्य प्रदेश की पत्रकारिता में कई ऐसे नाम हैं जो बरसों से सत्ता के बेहद क़रीब रहे हैं। सुविधाएँ, पहुँच, विशेषाधिकार—सब कुछ उन्हें मिलता रहा है, बशर्ते पत्रकारिता सत्ता के लिए असुविधाजनक न हो। अब उनके सामने धर्मसंकट है।
अगर वे अनुराग की खुलकर तारीफ़ करते हैं, तो सरकार और व्यवस्था नाराज़ हो सकती है, और नाराज़गी का मतलब है—सुविधाओं पर संकट।
अगर वे चुप रहते हैं, तो पत्रकारिता की बिरादरी में उनका चेहरा और बेनकाब होगा—और वह पहले से ही बहुत ढका हुआ नहीं है।
इसीलिए यह भी संयोग नहीं है कि अनुराग के समर्थन में सबसे मुखर आवाज़ें वे हैं जो मुख्यधारा से बाहर हैं—यूट्यूब पर काम कर रहे पत्रकार, छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्म, वैकल्पिक मीडिया। यानी जो लोग पहले ही जोखिम में हैं, वही आज जोखिम उठाने वाले पत्रकार के साथ खड़े हैं।
यह दृश्य अपने आप में बहुत कुछ कह देता है।
यहाँ से यह कहानी केवल इंदौर या मध्य प्रदेश की नहीं रहती। यह पत्रकारिता की वैश्विक कहानी बन जाती है—और वह कहानी डरावनी है।
International Federation of Journalists (IFJ) की 2025 की अंतिम रिपोर्ट इस डर को आंकड़ों में बदल देती है। साल 2025 में दुनिया भर में 128 पत्रकार और मीडियाकर्मी मारे गए। इनमें दस महिलाएं शामिल हैं। 533 पत्रकार जेलों में हैं।
1990 से अब तक 3,173 पत्रकारों की मौत दर्ज की जा चुकी है। यानी हर साल औसतन 91 मौतें। यह कोई संयोग नहीं है; यह एक पैटर्न है।
मध्य पूर्व, फ़िलिस्तीन, यमन, यूक्रेन, सूडान—ये सब अब सिर्फ़ युद्ध क्षेत्र नहीं, बल्कि पत्रकारों के कब्रिस्तान बनते जा रहे हैं। ड्रोन से पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है। मीडिया कार्यालयों पर बम गिराए जा रहे हैं।
भारत भी इससे अलग नहीं है। IFJ की रिपोर्ट बताती है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मारे गए पत्रकारों में भारत के चार पत्रकार शामिल हैं। यानी यहाँ भी सवाल पूछना सुरक्षित नहीं है—बस खतरे की शक्ल अलग है।
और यहीं इंदौर की घटना को दोबारा पढ़ना चाहिए। यहाँ गोली नहीं चली, ड्रोन नहीं उड़ा, लेकिन सत्ता ने वही संदेश दिया—चुप रहो।
आज पत्रकार को मारने की ज़रूरत नहीं पड़ती। उसे अपमानित कर दो, उसे “फोकट सवाल” पूछने वाला बता दो, उसे संस्थान के भीतर अकेला कर दो। यह भी दमन ही है—बस थोड़ा सभ्य, थोड़ा मुलायम, और कहीं ज़्यादा चालाक।
ऐसे समय में अनुराग द्वारी जैसे पत्रकार अपवाद हैं। वे मुख्यधारा में होते हुए भी सत्ता के प्रलोभन और दबाव के आगे झुकने से इनकार करते हैं। यही वजह है कि उनकी पत्रकारिता असुविधाजनक है।
और यही वह बुनियादी सच है जिसे हमें स्वीकार करना होगा—अगर पत्रकारिता सत्ता के लिए असुविधाजनक नहीं है, तो वह पत्रकारिता नहीं, प्रचार है।
आज अक्सर यह सवाल पूछा जाता है—पत्रकारिता इतनी कमजोर क्यों हो गई है? जवाब शायद यहीं है।
क्योंकि जोखिम उठाने की कीमत बहुत भारी हो गई है। नौकरी जा सकती है, ट्रांसफर हो सकता है, मुकदमे लग सकते हैं, संस्थान हाथ खींच सकता है। और इसके बदले जो मिलता है—वह सिर्फ़ आत्मसम्मान है।
हर कोई यह कीमत चुकाने को तैयार नहीं होता।
लेकिन इतिहास गवाह है कि पत्रकारिता कभी आराम से नहीं बची। वह हमेशा संकट में रहकर ही बची है। जब-जब पत्रकार सुरक्षित, संतुष्ट और सुविधाभोगी हुए हैं, तब-तब सत्ता निरंकुश हुई है।
आज जो लोग यूट्यूब पर बैठकर सवाल पूछ रहे हैं, वे दरअसल वही खाली जगह भर रहे हैं जिसे मुख्यधारा ने छोड़ दिया है। यह मुख्यधारा के लिए चेतावनी भी है और आईना भी।
इस पूरे परिदृश्य में जनता की भूमिका सबसे अहम है। अगर जनता यह मान ले कि सवाल पूछना बदतमीज़ी है, कि जवाबदेही माँगना “फोकट” है, तो पत्रकार अकेला पड़ जाएगा।
लेकिन अगर जनता यह समझे कि एक ईमानदार पत्रकार का सवाल पूरी भ्रष्ट व्यवस्था को हिला सकता है, तो वही सवाल लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त बन जाता है।
याद रखिए—सरकारी खैरात पर पल रही पत्रकारिता सिर्फ़ सत्ता की नहीं, समाज की भी सेवा नहीं करती। वह चुप्पी का सौदा करती है। और चुप्पी, अंततः, हर अन्याय की साझेदार होती है।
आज नहीं तो कल, इस चुप्पी का हिसाब भी देना पड़ता है—इतिहास में, समाज में, और कभी-कभी आत्मा के सामने।
इंदौर की घटना कोई अंत नहीं है। यह एक संकेत है। एक चेतावनी है। और शायद एक उम्मीद भी।
अगर आज भी कोई पत्रकार सवाल पूछने की हिम्मत करता है, गाली के सामने खड़ा रहता है, और जानता है कि इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी—तो समझिए पत्रकारिता अभी ज़िंदा है।
क्योंकि सच यही है—
जब पत्रकार संकट में हो, तब मानिए कि पत्रकारिता सही दिशा में है।

