जंगलराज का नैरेटिव गढ़ने में सवर्णपरस्ती को दिया प्रश्रय
वीरेंद्र यादव / बिहार का मीडिया राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण प्रभाव का रहा है। 1980-90 का वह दौर था, जब कांग्रेस अवसान की ओर थी और समाजवादी विचारधारा ताकतवर हो रही थी। गैरकांग्रेसवाद मजबूत हो रहा था। इसी दौर में पिछड़ी जाति के नेताओं की एक बड़ी फौज भी तैयार हो रही थी। इसी के समानांतर मीडिया में एक भी एक ऐसी पीढ़ी पनप रही थी, जो कांग्रेस के सवर्णपरस्ती की हिमायती रही थी।
1990 में सत्ता बदली। नेताओं की वैचारिक धारा बदली। नयी धारा के लोग सत्ता में पहुंचे। यह राजनीति सत्ता का हस्तांतरण था। इसलिए सत्ता का चरित्र बदलने लगा। लेकिन मीडिया में तैयार हो रही पीढ़ी में बदलाव संभव नहीं था। क्योंकि मीडिया कभी वैचारिक आंदोलन या धारा का वाहक नहीं होता है। वह सदैव बाजार का बंधक होता है। बाजार के हिसाब से अपनी रणनीति, संपादकीय नीति और बाजार की मांग के अनुरूप प्रस्तुति तय करता है।
1990 में लालू यादव सत्ता में आये। इस सच को स्वीकार करना मीडिया की मजबूरी थी, लेकिन सवर्ण मानसिकता से पीड़ित मीडिया के लिए यह सब कुछ अपच और असहज था। कुछ महीनों तक सबकुछ स्वाभाविक रूप से चलता रहा। लेकिन मंडल आयोग के लागू करने की घोषणा के बाद मीडिया पूरी तरह इसके खिलाफ खड़ा हो गया। मीडिया मंडल विरोधी आंदोलन में न केवल खबर के स्तरों पर हवा दे रहा था, बल्कि उसमें साझीदार भी बन रहा था। जैसे-जैसे मंडल का आंदोलन तेज होता गया, वैसे-वैसे मीडिया भाजपा और सवर्णों का हितसाधक बनता गया। यह हितसाधना मुख्यमंत्री लालू यादव को खलनायक बनाने और बनाए रखने की हद तक प्रतिबद्ध रहा।
धीरे-धीरे लालू यादव का विरोध मीडिया का स्थायी चरित्र बन गया। मीडिया में 90 फीसदी से अधिक पत्रकार सवर्ण हुआ करते थे। उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता लालू यादव को खलनायक बनाने से जुड़ा हुआ था। इसलिए पूरी ईमानदारी से लालू यादव को उखाड़ फेंकने के सवर्ण अभियान का हथकंडा मीडिया बन गया था। 1990 से 2005 तक किसी भी अखबार में लालू यादव के वैचारिक संघर्ष और मंडल आयोग को लागू करने के अभियान में उनकी प्रतिबद्धता के पक्ष में कोई आलेख नहीं मिलेगा। कुछ सवर्ण पत्रकार ऐसे भी थे, जो मंडल आयोग की अनुशसाओं के हिमायती थे, लागू करने की घोषणा को समय की मांग बता रहे थे, लेकिन वे भी लालू यादव की कार्यशैली के घोर आलोचक थे।
2005 में नीतीश कुमार सत्ता में आते हैं। इसके बाद से पूरी सरकार और मीडिया एक जाति विशेष यानी यादव जाति को खलनायक बनाने का अभियान चला रहा है। 2005 तक लालू यादव को व्यक्तिगत रूप से टारगेट किया जा रहा था। इसके बाद यादव जाति को समग्रता से टारगेट किया जाने लगा। यह तो इस जाति की ताकत है, वैचारिक प्रतिबद्धता है और लड़ने की शक्ति है कि वह आज भी खड़ा है। सामंती मानसिकता की छाती पर ईंट रगड़ रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की यह ऐतिहासिक उपलब्धि ही मानी जाएगी कि उन्होंने एक जाति विशेष के खिलाफ सभी जातियों को खड़ा कर दिया है। पिछड़ावाद की आग और आंच को बुझा दिया है। गैरयादव पिछड़ी जातियों को फिर से सवर्णों का बंधुआ बना दिया है। बीस वर्षों के शासन काल में नीतीश कुमार की यही उपलब्धि है कि सामाजिक स्वाभिमान के आंदोलन को राजनीतिक गुलामी की गोद में धकेल दिया।
नीतीश कुमार फिर सत्ता में हैं। इस बार सरकार का बंधुआकरण हो गया है। सामाजिक और राजनीतिक बदलाव की धारा मंद पड़ गयी है, स्थिर हो गयी। एक कहावत है कि स्थिर पानी को गंदा होते देर नहीं लगती है। बिहार का पूरा गैरसवर्ण समाज उसी मंद पड़ गयी धारा का हिस्सा बन गया है। इस स्थिरता को भी सवर्णपरस्त मीडिया विकास का मानक बता रहा है। इसमें भी लालू यादव के खलनायकत्व की परछाई दिखा रहा है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

