प्रकाश नीरव / मैं मीडिया हूँ। मुझे चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन इन दिनों मेरी हालत वैसे हो गई है, जैसे गली का वो खंभा, जिस पर पोस्टर, विज्ञापन और कुत्तों की दया साथ-साथ लटकती रहती है। मेरी जिम्मेदारी थी सच्चाई बताना, मगर अब मैं सच्चाई को इतना सजा-धजा देता हूँ कि खुद सच्चाई भी मुझसे शर्मिंदा हो जाए।
Blog posts : "व्यंग्य"
मैं मीडिया हूँ
भूख का इतिहास-भूगोल और रिपोर्टिंग !
तारकेश कुमार ओझा/ क्या पता जब न्यूज चैनल नहीं थे तब हमारे सेलिब्रिटीज जेल जाते थे या नहीं... लेकिन हाल - फिलहाल उनसे जुड़ी तमाम अपडेट सूचनाएं लगातार मिलती रहती है। जब भी कोई सेलेब्रिटीज जेल जाता है तो मेरी निगाह उस पहले समाचार पर टिक जाती है जिसमें बताया जाता है कि फलां अब कैदी नंबर इतना बन गया है..…
मैं नहीं चम्मच चुरायो
दिनेश चौधरी/ अनुप्रास के उदाहरण के रूप में हम सब अपने बचपन से 'चाँदी के चम्मच से चटनी चटाई' पढ़ते आ रहे थे। अब चूंकि दसों दिशाओं में पतन का जोर है तो इसे 'चटनी चखते चाँदी की चम्मच चुराई' के रूप में पढ़ा जा सकता है। काम भले ही बुरा हो, अनुप्रास तो बढ़िया सधता है। यह कलाकर्म वाला मामला है, जिसे पश्चिमी क…
सुबह लाठी, शाम चपाती ...!!
तारकेश कुमार ओझा/ न्यूज चैनलों पर चलने वाले खबरों के ज्वार - भाटे से अक्सर ऐसी - ऐसी जानकारी ज्ञान के मोती की तरह किनारे लगते रहती हैं जिससे कम समझ वालों का नॉलेज बैंक लगातार मजबूत होता जाता है। अभी हाल में एक महत्वपूर्ण सूचना से अवगत होने का अवसर मिला कि देश के एक बड़े राजनेता का केस लड़ रहे वकील न…
यह मैने नहीं मेरी कलम ने लिखा ...!!
किसी ने बेसिरपैर की बातें कर दी और शुरू हो गया ट्वीट पर ट्वीट का खेल।
तारकेश कुमार ओझा/ मैं एक बेचारे ऐसे अभागे जो जानता हूं जिसे गरीबी व भूखमरी के चलते उसके बड़े भाई ने पास के शहर में रहने वाले रिश्तेदार के यहां भेज दिया। जिससे वह मेहनत - मजदूरी कर अपना पेट पाल सके। बेचारा जितने दिनों तक उसे का…
मारक होती “माननीय” बनने की मृगतृष्णा ...
तारकेश कुमार ओझा / ... देश और जनता की हालत से मैं दुखी हूं। इसलिए आपके बीच आया हूं। अब बस मैं आपकी सेवा करना चाहता हूं... राजनीति से अलग किसी दूसरे क्षेत्र के स्थापित शख्सियत को जब भी मैं ऐसा कहता सुुनता हूं तो उसका भविष्य मेरे सामने नाचने लगता है। मैं समझ जाता हूं कि यह बंदा भी माननीय बनने की मृगतृ…
समाजवादी नेताओं को मिले बेस्ट एंटरटेनर एवार्ड ...!!
तारकेश कुमार ओझा / बचपन में स्कूल की किताबों में स्वतंत्रता सेनानी लाल - बाल - पाल के बारे में खूब पढ़ा था। जिज्ञासा हो ने पर पता चला कि तीनों महान स्वतंत्रता सेनानी थे। जिनका आजादी के आंदोलन में बड़ा योगदान था। कॉलेज तक पहुंचने पर देश के सबसे बड़े सूबे के उस राजनैतिक परिवार के बारे में जानकारी हु…
समय की रेत, घटनाओं के हवा महल
तारकेश कुमार ओझा/ बचपन में टेलीविजन के पर्दे पर देखे गए दो रोमांचक दृश्य भूलाए नहीं भूलते। पहला क्रेकिट का एक्शन रिप्ले और दूसरा पौराणिक दृश्यों में तीरों का टकराव। एक्शन रिप्ले का तो ऐसा होता था कि क्रिकेट की मामूली समझ रखने वाला भी उन दृश्यों को देख कर खासा रोमांचित हो जाता था। जिसे चंद मिनट पहले…
अथ श्री चचा कथा ....!!

नई खबर - पुरानी को चलन से बाहर कर देती है
तारकेश कुमार ओझा/ वाणिज्य का छात्र होने के नाते कॉलेज में पढ़ा था कि बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है। पेशे के नाते महसूस किया कि नई खबर - पुरानी को चलन से बाहर कर देती है। अब हाल तक मेरे गृह प्रदेश के कुछ शहरों में उत्पन्न तनाव का…
सोशल मीडिया इंश्योरेंस : लिखने की आजादी
एम् एम् चन्द्रा/ देश में चल रही अभिव्यक्ति की आजादी की डिबेट में “सोशल मीडिया इंश्योरेंस” कंपनी भी कूद पड़ी है. यह इंश्योरेंस सोशल मीडिया पर प्रत्येक व्यक्ति को बिना डरे, खुल के लिखने के लिए प्रेरित करती है. यदि सवाल देश भक्ति और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा हो तो यह ओर भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण बन जाता …
अनकही कहानी... अनकहा दर्द ...
मेरी निगाहें अपने जैसे आम आदमी से जुड़ी खबरें तलाश रही है
तारकेश कुमार ओझा/ जीवन के शुरूआती कुछ वर्षों में ही मैं नियति के आगे नतमस्तक हो चुका था। मेरी समझ में यह बात अच्छी तरह से आ गई थी कि मेरी जिंदगी की राह बेहद उबड़ - खाबड़ और पथरीली है। प्रतिकूल परिस्थितियों की जरा सी फिसलन मुझे इसे पर ग…
खिलाड़ियों की मस्ती और सुल्तान का गुणगान...!!

तारकेश कुमार ओझा/ समय, पहर या दिन कैसे बीत जाते हैं पता ही नहीं चलता। अब देखिए देखते - देखते एक सप्ताह बीत गया। इस बीच हमने शांति की तलाश में भटक रही दुनिया को और अशांत होते देखा। आतंकवाद और कट्टरतावाद का दावानल उन देशों तक भी पहुंच गया, जो अब तक इससे अछूते थे। राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य की बात क…
किसका जन्म दिन , कौन मतवाला...!!

तारकेश कुमार ओझा/ उस रोज टेलीविजन पर मैं एक राजनेता का जन्म दिन उत्सव देख रहा था। लगा मानो किसी अवतारी पुरुष का जन्म दिन हो। नेताजी के बगल में उनका पूरा कुनबा मौजूद था। थोड़ी देर में मुख्यमंत्री से लेकर तमाम राजनेता उनके यहां पहुंचने लगे। दिखाया गया कि नेताजी ने अपने किसी शुभचिंतक को निराश नहीं…
फिल्म वालों से नाराज कोटेश्वर ...!!

तारकेश कुमार ओझा/ जिंदगी मुझे शुरू से डराती रही है। इसके थपेड़ों को सहते - सहते जब मैं निढाल होकर नींद की गोद में जाता हूं, तो डरावने सपने मुझे फिर परेशान करने लगते हैं। जन्मजात बीमारी की तरह यह समस्या मुझे बचपन से परेशान करती आई है। होश संभालने के साथ ही मैं इस विभीषिका से पीड़ित रहा हूं।
उ…
किसी की सफलता , किसी की सजा...!!
तारकेश कुमार ओझा/ उस दिन मैं दोपहर के भोजन के दौरान टेलीविजन पर चैनल सर्च कर रहा था। अचानक सिर पर हथौड़ा मारने की तरह एक एंकर का कानफाड़ू आवाज सुनाई दिया। देखिए ... मुंबई का छोरा - कैसे बना क्रिकेट का भगवान। फलां कैसे पहुंचा जमीन से आसमान पर। और वह उम्दा खिलाड़ी कैसे बन गया खलनायक। माजरा समझते देर …
चिंतन बढ़े तो चिंता घटे ...!!
तारकेश कुमार ओझा/ चिंता और चिंतन की दुनिया भी अजीब है। हर इंसान की चिंता अलग - अलग होती है। जैसे कुछ लोगों की चिंता का विषय होता है कि फलां अभिनेता या अभिनेत्री अभी तक शादी क्यों नहीं कर रहा या रही। या फिर अमुक जोड़े के बीच अब पहले जैसा कुछ है या नहीं। एक समूह की चिंता आइपीएल और क्रिकेट मैचों की इर्…
लोगों की फेसबुक पोस्ट ने बनाया लिखने का मूड
डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ कई दिनों से लिखने का मूड बना रहा था परन्तु ऐसा सम्भव होता दिख नहीं रहा था। सोचा चलो अब लिखने से तौबा ही कर लिया जाए लेकिन फिर सोचने लगा कि जब तक जीना है लेखन तो करना ही पड़ेगा- ऐसा करके ही अपना अस्तित्व कायम रख पाऊँगा। फिर प्रश्न उठा किस विषयवस्तु को अपने लेखन का प्लाट मा…
माल्या प्रा... तुस्सी ग्रेट हो...!!
तारकेश कुमार ओझा/ जन - धन योजना तब जनता से काफी दूर थी। बैंक से संबंध गिने - चुने लोगों का ही होता था। आलम यह कि नया एकाउंट खुलवाने के लिए सिफारिश की जरूरत पड़ती। किसी भी कार्य से बैंक जाना काफी तनाव भरा अनुभव साबित होता था। क्योंकि रकम जमा करानी हो या निकासी करनी हो, लंबी कतार अवश्यंभावी होती। ए…
बकवास के लिए हमारे पास टाइम नहीं

डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ हैल्लो! जी हाँ बोलो- पर ध्यान रहे तुम्हारी बकवास के लिए हमारे पास टाइम नहीं है। क्यूँ जी ऐसा काहें को बोल (कह) रहे हैं? यार बड़े घामड़ हो- देख नहीं रहे हो- पूरे देश में रोहित वेमुला, कन्हैया, ऋचा सिंह जे.एन.यू./इलाहाबाद विश्व विद्यालय छाया हुआ है- एक तुम हो कि इस हाला…
साहित्य में ' मीट '...!!

तारकेश कुमार ओझा/ साहित्य समारोह- उत्सव या सम्मेलन की बात होने पर मुझे लगता था इस बहाने शब्दकर्मियों व साहित्य साधकों को उचित मंच मिलता होगा। एक ऐसा स्थान जहां बड़ी संख्या में साहित्य साधक इकट्ठे होकर साहित्य साधना पर वार्तालाप करते होंगे। छात्र जीवन में एक बड़े पुस्तक मेले में जाने का अवसर मिलन…
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सम्पादक
डॉ. लीना
