मुख्यमंत्री को पत्र लिख, 2023-24 के प्रदत्त पुरस्कार रद्द किये जाने सहित कई मांगें साहित्यकारों ने की
पटना/ अनंत/ 23 अगस्त को बिहार राजभाषा विभाग द्वारा दिये जाने वाले साहित्य सम्मान को लेकर विवाद छिड़ गया है। पुरस्कार घोषित किये जाने को लेकर विभाग सावधानी बरत रहा है, लेकिन जैसे ही दिनकर सम्मान दिये जाने की सूचना कवि/पत्रकार विमलकुमार को पत्र द्वारा प्राप्त हुआ उन्होंने यह पुरस्कार लौटाने का पत्र विभाग को भेजा और सोशल मीडिया पर जारी कर दिया।
इन पत्रों के आने के बाद पटना के साहित्यकारों ने राजभाषा पुरस्कारों की पद्धति पर सवाल उठाये हैं। जिसमें परस्पर लाभ के लिए पुरस्कार देने से लेकर जातिवादी निर्णय के आरोप लगाये गये हैं। मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में साहित्यकारों ने मांग की है कि
1. 2023-24 के प्रदत्त पुरस्कार रद्द किये जायें
2. वर्तमान चयन समिति को भंग किया जाये
3. हर वर्ष समितियां अलग-अलग गठित हों
4. समिति जाति और जेंडर के आधार पर समावेशी हो
5. पुरस्कारों में जाति और जेंडर का समावेशन हो
6. 2023-24 के लिए दिये जा रहे पुरस्कारों की प्रक्रिया की जाँच भी कार्रवाई जाये कि आवेदन और अनुशंसा के बिना विमल कुमार को पुरस्कार कैसे मिला?
साहित्यकारों ने लिखा है कि
2023-24 के लिए राजभाषा पुरस्कारों की घोषणा अभी आधिकारिक रूप से सरकार ने नहीं की है, लेकिन राष्ट्रकवि दिनकर के नाम से दिये जाने वाले पुरस्कार से सम्मानित एक कवि ने पुरस्कार लौटने की घोषणा कर दी है, और इस आशय की खबर एक-दो अखबारों में आई है। यह घटना राजभाषा विभाग और पुरस्कार वितरण प्रणाली पर कई बड़े सवाल खड़े करती है।
कवि द्वारा पुरस्कार लौटाने की घटना की सोशल मीडिया में खबर और उनके द्वारा पुरस्कार प्राप्ति का पत्र सोशल मीडिया में सार्वजनिक किये जाने से हमें यह पता चला है कि माननीय मुख्यमंत्री 23 अगस्त 2025 को यह पुरस्कार वितरित करने वाले हैं। इसके पहले इन सवालों के जवाब और अनुकूल कार्रवाई जरुरी है।
बिहार की राजभाषा पुरस्कारों के कुछ चर्चित तथ्य
1. समिति के सदस्य परस्पर लाभ (Quid-Pro-Quo) के आधार पर निर्णय करते रहे हैं। इस बार भी दिया जाने वाला वीपी मंडल पुरस्कार सहित्यकार शिव नारायण को दिया जा रहा है। शिव नारायण नई धारा पत्रिका के सम्पादक हैं, जो नई धारा नाम से पुरस्कार देता है। शिवनारायण ने पहले राजभाषा पुरस्कार की चयन समिति के वर्तमान अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी को नई धारा सम्मान दिया और बदले में विश्वनाथ तिवारी उन्हें उपकृत कर रहे हैं।
2. शिवनारायण को इसके पहले 2003 में राजभाषा विभाग द्वारा बाबा नागार्जुन सम्मान मिल चुका है। इस बार का वीपी मंडल सम्मान भी उन्हें दिया जा रहा है। तथ्य ही अपने आप में स्पष्ट है।
3. इस बार जिन विमल कुमार को दिनकर पुरस्कार मिला, उनका कोई भी काव्य संग्रह साहित्य जगत में उस स्तर का नहीं माना गया है, जिसकी चर्चा भी हुई हो। विमलकुमार पिछड़े-दलित नेतृत्व के प्रति अपमानजनक टिप्पणियां करते रहे हैं और बिहार को बदनाम करने वाले लेख लिखते रहे हैं।
4. अबतक किसी भी गैर ब्राह्मण अथवा ओबीसी और दलित, अल्पसंख्यक अथवा महिला साहित्यकार को सबसे बड़ी राशि वाला शिखर सम्मान नहीं मिला है और इस बार भी ब्राह्मण आलोचक/लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी को यह सम्मान दिया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि वे मूर्धन्य आलोचक, लेखक नहीं हैं। हैं। लेकिन ओबीसी या दलित अथवा महिला साहित्यकार को आजतक यह सम्मान नहीं मिला है। यह एक खास पैटर्न के बारे में स्पष्ट संकेत देता है।
5. अधिकांशतः ऊंची जाति के पुरुष साहित्यकारों को सम्मान दिया जाता रहा है। इसपर भी कई बार विवाद हुए हैं।
6. चयन समिति के सदस्यों ने इसके पूर्व भी अपने रिश्तेदारों को पुरस्कार दिया है, जो राजभाषा पुरस्कारों के लिए सरकार द्वारा निर्धारित नियम के विरुद्ध है।
7. विमल कुमार ओबीसी-दलित नेतृत्व के खिलाफ जातिवादी टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं।
2023-24 और 2024-25 के लिए भी जो समिति बनी है उसमें वैसे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने भारत सरकार से सम्बद्ध साहित्य अकादमी द्वारा दिये गये पुरस्कारों की वापसी अभियान में बढ़चकर हिस्सा लिया था और जो उस अभियान के विरोधी थे। स्वयं पूर्व साहित्य अकादमी अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी ने पुरस्कार वापसी की निंदा की थी लेकिन समिति में उन्होंने पुरस्कार वापसी के नेताओं में से एक पुरुषोत्तम अग्रवाल के साथ मिलकर विमल कुमार का नाम तय किया, जिसने बिहार में भी एक पुरस्कार वापसी की घटना को अंजाम दे दिया है।
मान्यवर
जिस कवि, विमल कुमार, को यह पुरस्कार दिया गया है,वे पत्रकार भी रहे हैं। प्रतिष्ठित अख़बार जनसत्ता में 31 अगस्त 2002 को प्रकाशित उनके लेख में जन विरोधी और दलित-ओबीसी नेतृत्व विरोधी उनकी एक टिपण्णी बेहद आपत्तिजनक है। उन्हें दिनकर सम्मान से सम्मानित किये जाने और पुरस्कार लौटाने की घटना के बीच वह टिप्पणी फिर से चर्चा में है और चयनकर्ताओं की जातिवादी सांठगांठ को उजागर करती है।
उन्होंने लिखा था, 'ये गालियां बिहार की सत्ता के उन सूत्रधारों के लिए है जिनको शासन करने का न जन्मना हक है, न संस्कार। इन जाहिलो के हाथ में बिहार है तो गालियां क्यों नहीं दी जाएंगी।'
सवाल है कि यह पुरस्कार इन जातिवादी कवि/पत्रकार को क्यों दिया गया ? किसने अनुशंसित किया। कवि का दावा है कि उन्होंने आवेदन नहीं किया था। इस पत्र के साथ विमलकुमार की टिपण्णी का माननीय जाबिर हुसैन द्वारा किये गये उल्लेख की प्रति और विमलकुमार द्वारा जारी पत्रों को संग्लग्न किया जा रहा है।

