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 मीडियामोरचा

____________________________________पत्रकारिता के जनसरोकार

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रामसिंह की ट्रेनिंग

मॉस कम्युनिकेशन में यह नहीं पढाया जाता .... 

दिनेश चौधरी/ पिछले छः-सात दिनों से पड़ोस वाले घर से अजीब-सी आवाजें आती हैं। आवाज जानी-पहचानी सी लगती तो है, पर इतनी तीव्र होती है कि कुछ समझ में नहीं आता। कई बार जी में आता है कि अपना ही सिर दीवार पर ठोंक दिया जाए। इसके ठीक पहले यह भी ख्याल आता है कि पड़ोसी से बात कर ली जाए। भले आदमी हैं। इतनी सी शिकायत को अन्यथा नहीं लेंगे।

फिर एक दिन ठान ही लिया कि चाहे जो हो आज आर-पार की बात कर ही ली जाए। दरवाजे पर पहुँचा तो चीख-चिल्लाहट और बढ़ गई। मैंने साफ पहचाना, पड़ोसी के बेटे रामसिंह की आवाज थी। मैं उल्टे पाँव लौट आया।

रामसिंह शायद विक्षिप्त हो गया है। ओह कितना बुरा हुआ पड़ोसी गोपाल भाई के साथ! जवान-जहीन लड़का था। पढाई में तेज और उतना ही विनम्र भी। कभी सीढ़ियों पर मिल जाता तो जबरन हाथ में रखा झोला वगैरह खुद थाम लेता। कहता, 'लाइए अंकल, ऊपर तक छोड़ दूँ।' मना करने से भी कहाँ सुनता। अब तो यह हो गया था कि दिख जाए तो मैं खुद ही उसे सामान थमा देता। पत्नी कहती, 'गोपाल भाई कितने भाग्यशाली हैं जो ऐसा बेटा नसीब हुआ। आजकल तो पढ़-लिख लेने के बाद लड़कों के सिर सातवें आसमान पर चढ़ जाते हैं।'

मैंने घर आकर सिर थाम लिया। 'उफ! क्या गुजर रही होगी गोपाल भाई पर।' पर मामला इतना संवेदनशील था कि उनसे बात करने की हिम्मत नहीं पड़ी। कैसे पूछता कि क्या हो गया है उनके इतने प्यारे-से बेटे को? जब मैं ही इतना परेशान हो गया हूँ तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि गोपाल भाई का क्या हाल होगा।

बचपन की कुछ धुंधली-सी यादें हैं। एक बार शायद पिता के साथ मानसिक आरोग्य-शाला गया था। उनके कोई परिचित वहाँ भर्ती थे। एक लंबा अंधेरा-सा गलियारा था। गलियारा जहाँ खत्म होता था, वहाँ तीन ओर लोहे की सींखचों वाले दरवाजे थे। किसी एक में वह व्यक्ति नमूदार हुआ, जिससे मिलने गए थे। वह बेतरह रो रहा था और वहाँ नहीं रहना चाहता था। मैं सोच रहा था कि वह कितनी खौफनाक जगह होती होगी, जहाँ एक पागल इंसान भी नहीं रहना चाहता। मैंने अपने सिर को जोर से झटकारा। यह मैं क्या सोच रहा हूँ, यह मैं क्यों सोच रहा हूँ!

आवाज असहनीय रूप से तेज हो रही थी। सोचा घर से दूर टहल आना ही ठीक है। सीढ़ियों से उतरा ही था कि गोपाल भाई मिल गए। अप्रत्याशित रूप से उन्होंने हमेशा की तरह तंज में कहा, " कहाँ चल दिए मिस्टर घोस्ट" और ठहाका मारकर हँसने लगे। मैं चौंका। घर में बेटे की यह दशा है और ये जनाब ठहाके लगा रहे हैं!

सरकारी नौकरी में होने के कारण में छद्म नाम से लिखता हूँ। वे मेरा परिचय 'घोस्ट राइटर' के रूप में कराते हैं और अक्सर राइटर शब्द गोल कर जाते हैं। उनका ठहाका रुक गया तो कहा, 'चलो राजेश के ठेले से पान खा आएं।' रास्ते भर वे बिल्कुल सामान्य ढंग से वैसे ही बातें करते रहे, जैसे पहले करते थे। मैं अलबत्ता गुमसुम-सा था। उल्टे उन्होंने ही मुझसे कहा, "क्या बात है राइटर साहब, सब ठीक तो है! या दिमाग में कोई नया प्लॉट चल रहा है?"

मुझे खटका-सा लगा। अब मैंने साहस जुटा कर पूछ ही लिया, " रामसिंह को क्या हुआ है?" वे थोड़ी देर चुप रहे। फिर कुछ समझकर जोर से हँसे। बोले, " अच्छा! तो तुम इसीलिए चुप-चुप हो। रामसिंह बढ़िया है। नई-नई जॉब लगी है। तुम तो जानते हो वह कितना विनम्र है। बात करने का सलीका है उसे। पर बॉस उससे खुश नहीं है। कह रहा था कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो मजबूरन उसे फायर करना पड़ेगा। उसके पेशे के लिए यह ठीक नहीं है।"

"मैंने बहुत गम्भीरता से विचार किया", गोपाल भाई ने कहा। "फील्ड के लोगों से भी बात की। सबका कहना था कि वहाँ नम्रता नहीं आक्रामकता चलती है। शब्दों को फेंककर मारना होता है। चीखना-चिल्लाना तो बहुत सामान्य है। अतिथि को बोलने के लिए उकसाना है और जब वह बोलने पर आए तो बोलने का मौका नहीं देना है। छद्म उत्तेजना का माहौल इस तरह तैयार करना है, जैसे सुई चुभोते ही गुब्बारा फट पड़े। ऐसा काम कोई शिष्ट-सामान्य व्यक्ति तो कर नहीं सकता। मजबूरन एक साइकैट्रिस्ट को हायर किया है। पागलपन के लक्षण पर कोर्स चल रहा है, मॉस कम्युनिकेशन में यह नहीं पढाया जाता।"

गोपाल भाई ने एक ठंडी सांस ली। कहा," मैंने पहले ही कहा था कि न्यूज एंकर की जॉब तुम्हारे लिए ठीक नहीं है, लेकिन वह नहीं माना..। पर कोई बात नहीं। मैनेजमेंट ने 15 दिन की लीव विथ सैलरी दी है। अब वह अच्छा करने लगा है। 15 दिन में पूरा ट्रेंड हो जाएगा।

मैंने कुछ सोचकर कहा, "बुरा मत मानियेगा, मैं अपने घर से टेलीविजन का तार अलग करवा रहा हूँ।" उन्होंने संजीदगी से कहा," मैंने पहले ही कटवा लिया है। जरूरी नहीं कि अफीम का कारोबार करने वाले सब अफीमची ही हों।"

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पुरालेख--

सम्पादक

डॉ. लीना